Uttarakhand

गंगा दशहरा 2026 की तिथि को लेकर भ्रम दूर, 25 मई को मनाया जाएगा पर्व

भारतीय संस्कृति में समय की गणना केवल तिथियों और दिनों का क्रम नहीं है, बल्कि यह धर्म, प्रकृति, ग्रह-नक्षत्र और मानव जीवन के गहरे संबंधों का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक आधार भी है। भारतीय पंचांग में आने वाला पुरुषोतम मास इसी महान परंपरा का अद्‌भुत उदाहरण है। इसे अधिक मास” भी कहा जाता है। यह मास लगभग प्रत्येक 32 महीने 16 दिन के अंतराल में आत्ता है और विशेष रूप से भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है।

ज्योतिष शास्त्र में पुरुषोतम मास का अत्यंत गहन महत्व है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, यहदोष शांति, कर्म परिष्कार तथा आध्यात्मिक उन्नति का श्रेष्ठ अवसर माना गया है।

भारतीय पंचांग चंद्रमा और सूर्य दोनों की गति पर आधारित है। चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का। दोनों में लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। यही अंतर लगभग तीन वर्षों में एक अतिरिक्त मास उत्पन्न करता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।

जब किसी चंद्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती, तब वह मास “अधिक मास” कहलाता है। बाद में भगवान विष्णु ‌द्वारा स्वीकार किए जाने के कारण इसे “पुरुषोतम मास” नाम प्राप्त हुआ।

यह व्यवस्था भारतीय ज्योतिष की अद्‌भुत गणनात्मक क्षमता और खगोलीय जान को दर्शाती है।

पुरुषोतम मास की पौराणिक कथा
पुराणों के अनुसार अधिक मास की अन्य महीनों ‌द्वारा तिरस्कृत किया गया था क्योंकि उसमें कोई संक्राति नहीं होती थी। दुखी होकर वह माल भगवान विष्णु के पास गया। तब विष्णु भगवान ने उसे अपना नाम पुरुषोतम प्रदान किया और कहा कि यह मास सभी महीनों में श्रेष्ठ होगा।

तभी से यह मास भक्ति, तप, जप और मोक्षदायक साधनाओं का सर्वोतम समय माना जाने लगा।

वि. संवत् 2083 में प्रथम ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा तदनुसार 17 मई, रविवार से ज्येष्ठ अधिक मास प्रारम्भ होकर 15 जून, सोमवार तक व्याप्त रहेगा। पुरुषोतम ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष और द्वितीय ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष दोनों पक्षी के अंतराल में किसी भी संक्रांति का अभाव होने से ज्येष्ठ मास की अधिक मास अर्थात पुरुषोत्तम मास माना जाता है।

गंगा दशहरा पर्व सामान्यतः ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन माता गंगा दशहरा के पृथ्वी पर अवतरण का वर्णन मिलता है। गंगा दशहरा के एक दिन बाद निर्जला एकादशी का उपवास रखा जाता है। परंतु इस वर्ष ज्येष्ठ मास में अधिक मास है जिस कारण पर्व को लेकर असमंजस की स्थिति है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी की ‘गड़‌ङ्गा दशहरा पर्व मनाया जाता है। पुराणों में वर्णित आख्यायन अनुसार पूर्वाहण-व्यापिनी ज्येष्ठ शुक्ल दशमी की हस्तनक्षत्र कालीन स्वर्ग से श्रीगड़‌ङ्गा का अवतरण हुआ था। अतएव इसदिन श्रीग‌ङ्गा आदि का स्नान, अन्न-वस्त्वादि का दान, पितृ-तर्पण, अप-तप, उपासना और उपवास किया जाए तो दस प्रकार के पाप (तीन प्रकार के कायिक, चार प्रकार के वाचिक और तीन प्रकार के मानसिक) दूर होते हैं।

ज्येष्ठ मासि सिले पक्षे दशमी हस्तसंयुता।

हरले दश पापानि तस्माद् दशहरा स्मृता ।। (ब्रहमपुराण)

योगाधिक्ये फलाधिक्यात् इसमें (दस योगी) से जितने योगों की अधिकता रहे उतना फल अधिक होता है। ज्येष्ठ अधिक मास होने की स्थिति में, उसी अधिक मास में यह पर्व मनाया जाता है, शुद्ध में नहीं।

‘ज्येष्ठे मलमासे सति तत्रैव दशहरा कार्या, न तु शुद्ध।

दशहरासु नोत्कर्षः चतुव्वैपि युगादिषु ऋष्यश्रृंग (हेमादि)

अतः शास्त्रानुसार ज्येष्ठ अधिक मास में गङ्गा-स्नान, पूजनादि करला शुद्ध ज्येष्ठ की अपेक्षा अधिक फलप्रदायक होता है। इस वर्ष 25 मई, 2026 ई., सोमवार को अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन ही श्रीग‌ङ्गा दशहरा (विशेषकर हरिद्वार में) का पर्व आयोजित होगा। इसदिन प्रातः 9-07 मि. बाद कन्यास्थ चन्द्र और सूर्य वृषस्थ भी है, जो इसे माहात्म्य प्रदान करता है।

कुछ तीर्थस्थलों पर गड्गा दशहरा अधिक मास की अपेक्षा शुद्ध ज्येष्ठ में मनाने की परम्परा B.